मैं और उनकी तन्हाई

मैं और उनकी तन्हाई
मैं और उनकी तन्हाई

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कविता

किससे नफ़रत करू , किससे प्यार ?
जानता हूँ जिंदगी बेबफा होती हैं,
फिर भी क्यूँ,
इससे इतना प्यार करता हूँ|
हर पल इसकी खुशी की खातिर,
सोचा करता हूँ|
बचपन से मा-बाप का बात,
शिक्षको का मार खाया,
सब ने एक ही बात समझाया,
मेहनत करोगे,
जिंदगी मे कभी दुख नही आएगी,
जिंदगी हमेशा खुशी-खुशी कट जाएगी|
रात को कम सोया,
दिन को दौर-दौरकर वर्ग मे गया,
इसकी खातिर|
जून की शरीर जला देने वाली गर्मी हो,
या दिसंबर की शरीर को मोम बना देने वाली ठंडी हो |
परीक्षा देता था इसकी खातिर,
परमाणपत्र मिली दौर-दौरकर |
नौकरी ढूंढता हूँ, इसकी खातिर |
जबकि जनता हू,
यह साथ नही निभयागी,
एक दिन मुझे छोड़कर चली जाएगी,
फिर भी क्यूँ,
इससे इतना प्यार करता हूँ|
मौत जो हमेशा,
हमे अपने गले  लगाने को तैयार रहती हैं,
उसके लिए कुछ नही करता हूँ,
हमेशा उससे भगा करता हूँ,
हरपल उससे नफ़रत ही करता हूँ|
फिर भी वो क्यूँ,
मुझसे इतना प्यार करती हैं |
मेरे नफ़रत को भुलाकर,
हमेशा अपने आगोश मे लेने को तैयार रहती हैं|
आख़िर क्यूँ,
शायद यही दुनिया कि रीत हैं,
जिसे मैं निभाता हूँ|
एक बेबफा पे प्यार-ही-प्यार लुटाता हूँ,
और जो सचा प्यार करती हैं,
उससे सिर्फ़ नफ़रत-ही-नफ़रत कर पाता हूँ |
जब ही इसपे सोचता हू,
तो सोचता ही रह जाता हूँ ||2||





कहानी मुसाफिर कि
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मुसाफिर बनकर इस दुनिया मे आते हैं,
तो क्यूँ किसी से दिल लगाते हैं,
किसी अजनबी को अपना बनाते हैं,
अकेले ही आते हैं इस दुनिया मे ,
इस दुनिया से अकेले ही जाते हैं,
तो फिर साथ जीने मरने का कसमे क्यूँ खाते हैं|
दोश्ती,मोहबत,नफ़रत,परिवार,
सब यही तो पाते हैं|
एक समय बाद सबको छोड़कर चले जाते हैं,
तो फिर क्यूँ,
बिछड़ने के बाद आंशु बहाते हैं|
जानते हैं मुसाफिर आते हैं,
हंसते हैं हँसातेहै|
सुख दुख मे साथ  निभाते हैं|
एक दिन सबको छोड़कर चले जाते हैं,
तो फिर क्यूँ ,
तो क्यूँ उनसे नयन लड़ाते हैं,
दिल मे उनको बासाते हैं|
जब वो छोड़कर चले जाते हैं|
तो बेबफा का इल्ज़ाम लगाते हैं|
इलज़ाम लगाने वाले,
एक हक़ीकत भूल जाते हैं,
वो भी एक मुसाफिर हैं,
खुद एक दिन सबको छोड़कर  चले जाते हैं|
तो फिर क्यूँ,
किसी पे ग़लत इलज़ाम लगाते हैं|
खुद ही बेबफ़ाई करते हैं,
दूसरो को बेबफा बताते हैं|
खुद भी सारे सफ़र मे रोते हैं,
और दूसरो को भी रुलाते हैं|
दिल हमारे नॅशवार शरीर का हिस्सा हैं,
और प्यार एहसास |
तो फिर क्यूँ,
दिल तोड़ने का इलज़ाम,
प्यार करने वाले पे लगाते हैं|
बिछड़ने का एहसास तो,
सभी को होता हैं,
ये तो सभी को तड़पाते हैं|
पर मुसाफिर को तो जाना है|
इसलिए साथ मे यादे लेकर चले जाते हैं,
और यादे ही छोड़ जाते हैं,
वो जो साथ ले जाते हैं,
वही हमारे पास भी छोड़ जाते हैं|
तो फिर क्यूँ,
हमेशा उनको धोखेबाज, बेबफा आदि नामो से बुलाते हैं|
आख़िर क्यूँ...क्यूँ...क्यूँ...||1||

             एक मुसाफिर-विजय कुमार




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